कर्तव्य पथ पर दिखेगी राजस्थान की 'उस्ता कला' की चमक: जानें बीकानेर की इस विश्व प्रसिद्ध कला की खासियत

 

दिल्ली के कर्तव्य पथ पर दिखेगा राजस्थान का जलवा: जाने उस्ता कला की पूरी कहानी

  • राजस्थान आज: भारत की सांस्कृतिक विविधता का केंद्र एक बार फिर दिल्ली का कर्तव्य पथ 26 जनवरी 2026 बनने जा रहा है। इस बार राजस्थान की प्रसिद्ध 'उस्ता कला' (Usta Art) अपनी स्वर्णिम आभा के साथ दर्शकों का मन मोहने के लिए तैयार है। बीकानेर की गलियों से निकलकर देश के सबसे प्रतिष्ठित मंच तक पहुँचने वाली  यह Camel Hide Gold Embossing कला न केवल राजस्थान का गौरव है, बल्कि भारतीय हस्तशिल्प की पराकाष्ठा भी है।
    Usta-art-bikaner
    Usta Art of Bikaner Rajsthan on kartvya path


  • उस्ता कलाकारों द्वारा बनाई गई कलाकारी देश ही नही विदेशों मे भी प्रसिद्ध है इसमे दुर्लभ मीनाकारी से सोने का काम किया जाता है जो अंत्यात ही आकर्षक और मनमोहक होता है वैसे तो इस कला से शीशियों,कुप्पियों,आइनों,डिब्बों पर कलाकारी की जाती है पर गणतंत्र दिवस के अवसर पर इसकी विशेष निराली ही छवि दिखाई देगी जिसके लिए कलाकार् काफी समय से प्रयास कर रहे है जिससे की इस आयोजन को यादगार बनाया जा सके दिनरात मेहनत से जूटे है   

क्या है? उस्ता कला (What is Usta Art?)

उस्ता कला मुख्य रूप से बीकानेर की एक विशेष कला शैली है, जिसमें ऊंट की खाल पर सोने की बेहद बारीक नक्काशी की जाती है। इस कला में सोने के वर्क (Gold Foil) का उपयोग करके सुंदर फूल-पत्तियां और ज्यामितीय आकृतियां बनाई जाती हैं। इसे 'मुनव्वत' (Munawwat) कार्य भी कहा जाता है। जो अत्यंत आकर्षक एवं मनमोहक होता हैं। शीशियों, कुप्पियों, आईनों, डिब्बोंमिट्टी की सुराही आदि पर यह कला उकेरी जाती है।

इतिहास और उत्पत्ति

इस कला की जड़ें मुगल काल से जुड़ी हैं। बीकानेर के छठे महाराजा राय सिंह व कर्ण सिंह जी  इस कला के पारखी थे वह कुछ उस्ता कलाकारो को मुगल दरबार से बीकानेर लाए थे मुग़ल दरबारों से यह कला उनके राजाओं के राज्यों में पहुँची तो वही स्थायी हो गयी। बीकानेर में छठे राजा रायसिंह के मुग़ल सम्राट अकबर से प्रगाढ सम्बन्ध थे। यह सम्बन्ध पीढी दर पीढी चलता रहा। इसी दौरान मुग़लों की कला संस्कृति बीकानेर पहुँच गयी। इस कला ने उस्ता जाति के कलाकारों के माध्यम से रेगिस्तान के महलों, हवेलियों, मंदिरों को इन्द्रधनुषी बना दिया। उस्ता जाति के कलाकारेां ने इस काला को सदियों तक संचित रखा। पीढ़ी दर पीढ़ी कला की बारिकियां हाथ बदलती रही। उन हाथों ने जिस चीज पर हाथ लगाया वह कला की अनमोल धरोहर बन गयी। बीकानेर ने इस कला ने अपने बहुआयामी रूप को उजागर किया विभिन्न प्रकार के चित्रों के माध्यम से रंगों तथा सुनहरी मनोवत से। सोनकिन, जुंगाली, सुनहरी, मीनाकारी तातला सुनहरी रंगाबेजी उभर कर सामने आयी। तथा उन्होंने इस कला को ऊंचाइया देने का प्रयास किया जो बाद मे दिल्ली दरबार से भी ज्यादा प्रसिद्ध हुई बीकानेर तब से बीकानेर इस कला का वैश्विक केंद्र बन गया। उस्ता अलीरजा, उस्ता हामिद रजा तथा रूकनुदीन प्रमुख कलाकार थे। उस्ता कला के सबसे महान कलाकार स्वर्गीय हिसामुद्दीन उस्ता को इस क्षेत्र में उनके योगदान के लिए 1986 मे पद्मश्री से भी नवाजा जा चुका है।

उस्ता-कलाकारी-प्रदर्शन
उस्ता कलकारी प्रदर्शन  

कैसे बनाई जाती है यह अद्भुत कला?

उस्ता कला का निर्माण एक जटिल और धैर्यपूर्ण प्रक्रिया है:

  1. बेस तैयार करना: सबसे पहले ऊंट की खाल को साफ करके उसे आकार दिया जाता है।
  2. मिट्टी का लेप: डिजाइन उभारने के लिए विशेष प्रकार की मिट्टी और गोंद का मिश्रण लगाया जाता है।
  3. स्वर्ण वर्क: जब डिजाइन सूख जाता है, तो उस पर असली सोने की परत चढ़ाई जाती है।
  4. रंगाई: सोने के काम को और निखारने के लिए प्राकृतिक रंगों (मुख्यतः लाल और हरे) का उपयोग किया जाता है।

कर्तव्य पथ पर प्रदर्शन का महत्व

कर्तव्य पथ पर राजस्थान की झांकी में उस्ता कला को शामिल करना कई मायनों में महत्वपूर्ण है:

  • सांस्कृतिक कूटनीति: गणतंत्र दिवस जैसे बड़े अवसरों पर ऐसी कलाओं का प्रदर्शन विदेशी मेहमानों के सामने भारत की 'सॉफ्ट पावर' को दर्शाता है।
  • कलाकारों को प्रोत्साहन: इस वैश्विक मंच से राजस्थान के स्थानीय हस्तशिल्पकारों को नई पहचान और बाजार मिलता है।
  • जीआई टैग की ताकत: हाल ही में बीकानेर की उस्ता कला को GI Tag मिला है, जो इसकी मौलिकता और गुणवत्ता की गारंटी देता है।

 

उस्ता कला Usta Art of Rajasthan केवल सजावट की वस्तु नहीं है, बल्कि यह राजस्थान के रेगिस्तान की जीवटता और वहां के कलाकारों की तपस्या का प्रतीक है। कर्तव्य पथ पर इसका प्रदर्शन यह संदेश देता है कि आधुनिक होते भारत में हमारी प्राचीन परंपराएं आज भी उतनी ही चमक रही हैं जितना कि उस्ता कला का सोना।



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